आम व्यक्ति की सोच का नजरिया और उसका बर्ताव देखकर, मैं कई बार यह सोचने पर विवश हो जाता हूँ कि क्या नेतृत्व क्षमता, जिसका हम इतना गुणगान करते हैं, वो वाकई मानव का स्वाभाविक गुण है भी अथवा नहीं?
आज राजनीति हो या प्रबंधन, व्यवसाय हो या नौकरी, सामाजिक संस्था हो अथवा कोई पारिवारिक आयोजन, हमें हर क्षेत्र में कुशल नेतृत्व की आवश्यकता होती है। अतः हम एक अच्छी नेतृत्व क्षमता के धनी व्यक्ति की तारीफ करते नहीं थकते। लेकिन क्या ऐसी क्षमता और प्रकृति वास्तव में स्वाभाविक है और सभी में ये गुण वांछनीय है?
हालाँकि मैं किसी ठोस निर्णय पर नहीं पहुँच पाया हूँ लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि नेतृत्वता हमारे अहम् को प्रतिष्ठापित करने की ही चेष्टा है। लेकिन आध्यात्मिक प्रगति के लिए तो हमें अपने अहम् पर ही विजय पाने का प्रयास करना होता है, न कि उसे और अधिक मजबूती देने का! दूसरे, नेतृत्व हमेशा अनुगामियों की फौज तैयार करवाता है और हम अपने आप को अपने अनुगामियों से बेहतर और विशिष्ट समझने लग जाते हैं।ये मानव-मानव में भेद-भाव का कारक भी बन जाता है। यदि कहीं नेतृत्व का गुण आवश्यक भी हो तो भी क्या हमें उसे कोई विशिष्टता का दर्जा देना उचित है?
मनुष्य भी अन्य प्राणियों की तरह बचपन से ही अपने बड़ों का अनुसरण करते-करते ही जीवन और समाज में रहन-सहन के तौर-तरीके सीखता है। अपने माता-पिता, शिक्षक अथवा समाज में जिस किसी के साथ भी एक बच्चे का अधिकांश समय बीतता है, वह उसी से सबकुछ सीखता है। आज के दौर में जब माँ-बाप अपने बच्चों के साथ अधिक समय नहीं बीता पाते हैं तो वह अखबार, टीवी, मोबाइल, कंप्यूटर आदि उपकरणों के माध्यम से लोगों को देखकर सीखता है। भोजन क्या और कैसे करना है, कपड़े कैसे और कौनसे पहनने हैं, क्या फैशनेबल है, नाचना कैसे है, क्रोध कैसे करना है इत्यादि बातें सभी बच्चे देखा-देखी ही सीखते हैं। इसे ही हम भेड़-चाल भी कह देते हैं। परंतु भेड़-चाल या भीड़ का अनुसरण करना सीखने की स्वाभाविक प्रक्रिया है।
आप अपने बच्चों को चाहे कितना ही किताबी ज्ञान दो, सैद्धांतिक बातें सीखाओ, धार्मिक और नैतिक शिक्षा दो लेकिन वो व्यवहार में वही सीखेंगे, जो आपको करते देखेंगे। अतः देखा-देखी नकल कर सीखना बच्चों का प्रकृति प्रदत्त स्वभाव है। हमें नकल करने की इस आदत को स्वीकार करते हुए उचित मान्यता देनी चाहिए। तभी हम बच्चों को सही एवं सहज तरीके से शिक्षित कर सकेंगे।
लेकिन समस्या तब खड़ी हो जाती है जब हम जीवनभर यही बचकानापन करते रह जाते हैं।एक बार वयस्क अवस्था में पहुँच जाने पर हमें अपना जीवन स्वयं जीना आ जाना चाहिए। दुर्भाग्य से हममें से अधिकाँश लोग बड़े हो ही नहीं पाते हैं और अपने जीवन-मूल्यों के निर्धारण हेतु भी आजीवन किसी न किसी गुरू की ओर देखते रहते हैं। यानि कि हम हमेशा किसी न किसी की वैचारिक गुलामी करने को राजी रहते हैं और आँख बंद कर उसके बताये मार्ग पर चलते चले जाते हैं। हम भौतिक दृष्टि से अपने आपको चाहे स्वतंत्र घोषित करें परंतु हम कभी भी वैचारिक और मानसिक रूप से स्वतंत्रता हासिल नहीं कर पाते। दरअसल, हम अपनी स्वयं की सोच और सिद्धांत विकसित ही नहीं कर पाते हैं और कभी भी अपना जीवन नहीं जीते हैं। किसी अन्य के सिद्धांत, किसी ओर का दर्शन, किसी ओर ने जो निष्कर्ष निकाला या पाया उसमें अंध-श्रद्धा स्थापित कर अपना संपूर्ण जीवन उसके हवाले कर देते हैं।
ऐसे में, मेरा सोचना है कि हममें से कुछ लोग अपने अहम् के अधीन हो चाहे दूसरे का नेतृत्व कर लें किंतु हम अपने खुद का नेतृत्व करने में अक्षम ही रह जाते हैं। जीवन का सही विकास हो तो बचपन से वयस्क अवस्था में पहुँचते-पहुँचते, हमारी भेड़-चाल की वृत्ति का लोप हो, हममें अपने स्वयं का नेतृत्व करने की क्षमता का विकास हो जाना चाहिए। तभी सही मायने में हम स्वतंत्र हो अपना स्वयं का जीवन जी पाएंगे।
आज हमारे समाज में व्यक्तिगत स्तर पर मौलिक विचार और दर्शन विलुप्त-प्रायः है। जब तक ऐसा नहीं होगा मानव सभ्यता का बौद्धिक विकास संभव नहीं है। अधिकांश समाज धर्म, शास्त्र, गुरूओं, सत्तासीन शक्तियों आदि की जंझीरों से जकड़ा हुआ पराधीन जीवन जी रहा है। किसी के पास अपनी स्वयं की कसौटी ही नहीं है, बस, उधार विचारधारा के अधीन अपना जीवन हवाले कर रखा है।
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Philosophy is the great virtue of a man,always man life depen on his own philosophy, thanks dwar
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That's what I was contemplating ...if every man has its own philosophy or not
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